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भारत के महान गोलकीपर मैनुअल फ्रेडरिक का निधन, 1972 ओलंपिक कांस्य पदक विजेता को हॉकी इंडिया ने दी श्रद्धांजलि

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मैनुअल फ्रेडरिक का निधन

म्यूनिख 1972 ओलंपिक के नायक मैनुअल फ्रेडरिक का निधन, हॉकी इंडिया ने जताया शोक

भारतीय हॉकी के इतिहास में अपनी अद्भुत गोलकीपिंग से पहचान बनाने वाले मैनुअल फ्रेडरिक का 78 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने बेंगलुरु के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। हॉकी इंडिया ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है और कहा कि उनका योगदान भारतीय हॉकी के स्वर्णिम इतिहास का अहम हिस्सा रहेगा।


भारतीय हॉकी में मैनुअल फ्रेडरिक का योगदान

मैनुअल फ्रेडरिक 1970 के दशक में भारतीय हॉकी टीम के प्रमुख गोलकीपर थे। उन्होंने अपनी तेज़ प्रतिक्रिया क्षमता और शानदार बचाव तकनीक से देश के लिए कई यादगार मैच खेले।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में आई, जब भारतीय टीम ने कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा। इसके बाद 1973 में नीदरलैंड्स में हुए हॉकी विश्व कप में उन्होंने रजत पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा बनकर अपनी छाप छोड़ी।


केरल के पहले ओलंपिक पदक विजेता

मैनुअल फ्रेडरिक केवल भारत ही नहीं बल्कि केरल के लिए भी गौरव का विषय थे। वे ओलंपिक पदक जीतने वाले केरल के पहले खिलाड़ी बने, जिसने राज्य में हॉकी के प्रति नई ऊर्जा और प्रेरणा जगाई।


सम्मान और उपलब्धियाँ

  • 1972 म्यूनिख ओलंपिक: कांस्य पदक विजेता
  • 1973 हॉकी विश्व कप (नीदरलैंड्स): रजत पदक
  • 2019: ध्यानचंद लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित

उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 2019 में हॉकी इंडिया द्वारा ध्यानचंद लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया, जो भारतीय हॉकी के प्रति उनकी निष्ठा और उत्कृष्टता का प्रमाण था।


हॉकी इंडिया ने व्यक्त किया शोक

हॉकी इंडिया के अध्यक्ष दिलीप तिर्की ने मैनुअल फ्रेडरिक के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा,

“फ्रेडरिक भारतीय हॉकी के सर्वश्रेष्ठ गोलकीपरों में से एक थे। उन्होंने खेल में जो योगदान दिया, वह हमेशा याद किया जाएगा। उनके निधन से भारतीय हॉकी परिवार ने एक महान खिलाड़ी खो दिया है।”


खेल जगत में शोक की लहर

मैनुअल फ्रेडरिक के निधन की खबर से खेल जगत में शोक की लहर है। देशभर के पूर्व खिलाड़ी और खेल प्रशंसक सोशल मीडिया पर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं।


निष्कर्ष:
मैनुअल फ्रेडरिक केवल एक उत्कृष्ट खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि भारतीय हॉकी के प्रेरणास्रोत थे। उनका जीवन समर्पण, संघर्ष और सफलता का प्रतीक रहा। भारतीय हॉकी इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा रहेगा।

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