ट्रम्प ने CBS के 60 Minutes शो में कहा —
“रूस, चीन, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया लगातार परमाणु परीक्षण कर रहे हैं। फर्क बस इतना है कि वे इसे छुपा लेते हैं। हम एक खुले समाज हैं, इसलिए हमारे कदम सबके सामने आते हैं।”
उन्होंने यहां तक कहा कि मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध की संभावना थी, जिसे उन्होंने अपनी मध्यस्थता से रोका।
🇺🇸 अमेरिका ने 33 साल बाद शुरू किए परमाणु परीक्षण
ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिकी रक्षा बलों को “नॉन-क्रिटिकल सिस्टम” परीक्षण शुरू करने का निर्देश दिया है। इसका उद्देश्य अमेरिकी हथियारों की विश्वसनीयता की जांच करना है।
हालांकि, अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने स्पष्ट किया कि ये विस्फोटक परीक्षण नहीं होंगे — यानी कोई वास्तविक परमाणु विस्फोट नहीं होगा।
अमेरिका का यह कदम वैश्विक शक्ति समीकरणों में एक नया मोड़ ला सकता है, खासकर तब जब चीन और रूस पहले से ही अंतरराष्ट्रीय संधियों को लेकर सवालों में हैं।
🔍 ISE विश्लेषण: राजनीतिक और वैश्विक सुरक्षा दृष्टिकोण
🧭 1. राजनीतिक प्रभाव
ट्रम्प का यह बयान अमेरिकी राजनीति में “सुरक्षा केंद्रित राष्ट्रवाद” को मजबूत करता है।
- यह दक्षिण एशिया (भारत-पाकिस्तान) में परमाणु तनाव बढ़ा सकता है।
- रूस-चीन पर आरोप से अमेरिका-एशिया संबंधों में कड़वाहट बढ़ने की आशंका है।
☢️ 2. वैश्विक सुरक्षा
यदि ट्रम्प के दावे सही साबित होते हैं, तो दुनिया फिर से Cold War जैसे हथियारों की दौड़ की ओर लौट सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह स्थिति विश्व शांति और परमाणु नियंत्रण समझौतों पर गंभीर असर डाल सकती है।
🌐 3. भारत का दृष्टिकोण
भारत के लिए यह बयान अहम है — क्योंकि
- उसके दो पड़ोसी देश (चीन और पाकिस्तान) पहले से परमाणु शक्ति संपन्न हैं।
- अगर यह परीक्षण सच साबित हुए, तो दक्षिण एशिया में सुरक्षा असंतुलन गहराने की संभावना है।
📊 विशेषज्ञों का कहना है
| विशेषज्ञ | बयान | स्रोत |
|---|---|---|
| डॉ. ब्रूस मिकेलसन, ग्लोबल सिक्योरिटी एनालिस्ट | “यह परमाणु शांति समझौतों के लिए सबसे बड़ा खतरा है।” | BBC |
| जोनाथन स्मिथ, US Defense Analyst | “अगर अन्य देश गुप्त परीक्षण कर रहे हैं, तो अमेरिका चुप नहीं रह सकता।” | Reuters |
| एशिया-पैसिफिक रिसर्च काउंसिल | “भारत और पाकिस्तान के लिए यह नई कूटनीतिक चुनौती है।” | India Today |
🔮 निष्कर्ष: विश्व फिर एक नई परमाणु दौड़ की ओर?
ट्रम्प का यह दावा केवल एक बयान नहीं, बल्कि वैश्विक परमाणु नीति में उथल-पुथल का संकेत है।
जहाँ अमेरिका खुद को सुरक्षा नेतृत्व में आगे रखना चाहता है, वहीं चीन-रूस-पाकिस्तान जैसे देशों की भूमिका पर अब और निगाहें टिकेंगी।
भारत जैसे क्षेत्रीय लोकतंत्रों के लिए यह समय रणनीतिक संयम और संवाद को मजबूत करने का है, ताकि परमाणु तनाव को रोका जा सके।